टोक्यो ओलंपिक: हॉकी खिलाड़ी उदिता व शर्मिला के परिजन बोले- हार से पदक की उम्मीद टूटी, बेटियों की हिम्मत नहीं

हिसार के कैमरी निवासी शर्मिला का अब तक का सफर संघर्षपूर्ण रहा। पिता सुरेश गोदारा ने बताया कि वर्ष 2008 की बात है। उस समय वह बीमार थे। घर में आर्थिक तंगी चल रही थी। बेटी ने हॉकी के 500 रुपये मांगे तो पिता ने मना कर दिया। उस समय प्रवीणा सिहाग शर्मिला के लिए फरिश्ता बनकर आईं और बेटी का टेलेंट देख हॉकी दिलाई। उसके बाद शर्मिला ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपना करिअर बनाना शुरू कर दिया।

टोक्यो ओलंपिक में शुक्रवार को ब्रिटेन के साथ खेल गए मुकाबले में भारतीय महिला हॉकी टीम को हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही टीम की कांस्य पदक जीतने की उम्मीद और ओलंपिक का सफर खत्म हो गया। ओलंपिक में टीम चाहे कोई पदक न जीत सकी हो लेकिन उनके खेल ने पूरी दुनिया का दिल जीत लिया है।

हिसार की खिलाड़ी उदिता और शर्मिला के परिजनों ने कहा कि बेटियां खूब खेली, अच्छा खेली। हालांकि मुकाबले के अंतिम क्षण तक परिजन बेटियों की जीत के लिए हाथ-जोड़कर कामना करते रहे। उन्होंने कहा कि इस हार से मेडल की उम्मीद टूटी है, बेटियों की हिम्मत नहीं। आगे और मौके मिलेंगे। इस हार से सीख लेनी होगी। परिजनों ने कहा कि बेटियों ने जीत के लिए संघर्ष किया, तभी तो हार पर फूट-फूट कर रोईं। 

शुक्रवार सुबह मैच शुरू होने के साथ ही दोनों खिलाड़ियों के परिजनों ने तालियां बजाकर हौसला बढ़ाया। मुकाबले में 2-0 से पिछड़ने के बाद 3-2 की बढ़त लेना बेटियों के हौसले को दिखाता है लेकिन किस्मत में इस बार पदक नहीं था। हार से परिजनों के साथ खेल प्रेमियों में मायूसी छाई है।