
हर साल केंद्रीय बजट से कुछ दिन पहले पेश होने वाला Economic Survey सरकार की आर्थिक “रिपोर्ट कार्ड” की तरह होता है। यह दस्तावेज़ देश की अर्थव्यवस्था की सेहत का आकलन करता है—विकास दर, महंगाई, राजकोषीय घाटा, व्यापार, निवेश और भविष्य के जोखिमों तक।
लेकिन इस बार इकोनॉमिक सर्वे 2026 सिर्फ़ उपलब्धियों का ब्योरा नहीं है। इसके भीतर एक साफ़ चेतावनी छिपी है—कि मजबूत आर्थिक बुनियाद के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के प्रति अब भी संवेदनशील बनी हुई है।
7% ग्रोथ, फिर भी चिंता क्यों?
सर्वे के मुताबिक FY26 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 7% रही। यह अमेरिका और यूरोप (करीब 2%), विकासशील देशों के औसत (4%) और वैश्विक औसत (3%) से कहीं बेहतर है। इस तरह भारत लगातार चौथे साल दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
लेकिन सवाल यह है कि इतनी मजबूत ग्रोथ के बावजूद निवेशकों का भरोसा पहले जैसा क्यों नहीं दिख रहा?
ग्रोथ के तीन बड़े इंजन
1. उपभोग (Consumption)
देश की ग्रोथ का सबसे बड़ा सहारा घरेलू खपत बनी हुई है। निजी उपभोग अब GDP का 61.5% हो चुका है—FY12 के बाद सबसे ऊंचा स्तर। FY26 की पहली छमाही में उपभोग 7.5% बढ़ा।
महंगाई में तेज गिरावट (FY23 में 6.7% से घटकर FY26 में 1.7%) और बेहतर कृषि प्रदर्शन से लोगों की वास्तविक आय बढ़ी, जिससे ग्रामीण और शहरी मांग दोनों को सहारा मिला।
2. निवेश (Investment)
पूंजीगत व्यय—जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, मशीनरी और फैक्ट्रियों में निवेश—GDP का करीब 30% है और यह महामारी-पूर्व औसत से तेज़ बढ़ रहा है।
3. निर्यात (Exports)
हालांकि निर्यात ग्रोथ का मुख्य आधार नहीं है, लेकिन इसने सहारा ज़रूर दिया। FY26 की पहली छमाही में वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात 5.9% बढ़ा। खासतौर पर सेवाओं का निर्यात (आईटी, बिज़नेस सर्विसेज़) वैश्विक अस्थिरता के बीच अर्थव्यवस्था के लिए कुशन साबित हुआ।
सप्लाई साइड से कौन चला रहा है अर्थव्यवस्था?
उद्योग और सेवाएं इस समय विकास की अगुवाई कर रहे हैं।
- कृषि: अनुमानित 3.1% ग्रोथ, जिससे ग्रामीण आय को स्थिर सहारा
- उद्योग: मैन्युफैक्चरिंग के दम पर रफ्तार
- सेवाएं: करीब 9% की तेज़ वृद्धि, जो कुल ग्रोथ का सबसे बड़ा योगदानकर्ता है
फिर भी रुपया क्यों कमजोर?
यहीं से सर्वे का चेतावनी वाला हिस्सा शुरू होता है।
सरकार ने FY25 में राजकोषीय घाटा 4.8% तक सीमित रखा, जो लक्ष्य से बेहतर था। FY26 के लिए लक्ष्य 4.4% रखा गया।
इसके बावजूद रुपया कमजोर हुआ और जनवरी 2026 में डॉलर के मुकाबले ₹92 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक फिसल गया।
सर्वे का साफ़ निष्कर्ष है:
आज की दुनिया में सिर्फ़ मजबूत मैक्रो-इकोनॉमिक आंकड़े निवेशकों का भरोसा कायम रखने के लिए काफी नहीं हैं।
विदेशी पूंजी और बढ़ती निर्भरता
- FDI: अप्रैल–नवंबर 2025 के बीच सकल FDI 16.1% बढ़ा
- FPI: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने $3.9 बिलियन निकाला
- Balance of Payments: FY26 की पहली छमाही में $6.4 बिलियन का घाटा
इसका असर सीधे रुपये पर पड़ा और अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच रुपया करीब 6.5% कमजोर हुआ।
‘कॉन्फिडेंस टैक्स’ और ऊंची ब्याज दरें
विदेशी पूंजी पर निर्भरता का एक और असर उधारी की लागत पर दिखता है।
भारत की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 6.7% रही, जबकि समान क्रेडिट रेटिंग वाले इंडोनेशिया में यह लगभग 6.3% थी।
मतलब निवेशक भारत को थोड़ा ज़्यादा जोखिम भरा मानते हैं और अधिक ब्याज मांगते हैं।
समाधान क्या बताता है इकोनॉमिक सर्वे?
सर्वे के मुताबिक समस्या की जड़ भारत के एक्सपोर्ट स्ट्रक्चर में है।
सेवाओं का निर्यात मजबूत है, लेकिन यह विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम नहीं कर पाता। इसके लिए ज़रूरी है मैन्युफैक्चरिंग-आधारित निर्यात।
यही वजह है कि सर्वे संरक्षणवाद (Protectionism) के खिलाफ चेतावनी देता है। ऊंचे टैरिफ अल्पकाल में राहत दे सकते हैं, लेकिन लंबे समय में प्रतिस्पर्धा घटाते हैं और अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाते हैं।
इसी सोच के तहत भारत India–EU FTA जैसे समझौतों के ज़रिये टैरिफ घटाकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा अपनाने की दिशा में बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
Economic Survey 2026 का संदेश दो टूक है—
भारत की ग्रोथ मज़बूत है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब वैश्विक पूंजी पीछे हटे। दीर्घकालिक स्थिरता के लिए भारत को सेवाओं के साथ-साथ बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग और वैश्विक सप्लाई चेन में गहरी भागीदारी बढ़ानी होगी।
बजट से पहले यह सर्वे एक तरह से संकेत दे चुका है कि आगे की नीति सिर्फ़ विकास नहीं, बल्कि लचीलापन और आत्मनिर्भर मजबूती पर टिकी होगी।