
अमर उजाला की अनूठी मुहिम ‘मां तुझे प्रणाम’ की कड़ी में मंगलवार को गोरखपुर सिटी ऑफिस में शहीदों के परिजनों को सम्मानित किया गया। वीरांगनाओं की आंखें नम थीं, लेकिन मस्तक गर्व से ऊंचा रहा। सबने कहा देश का सम्मान सर्वोपरि है। देश व समाज की सुरक्षा की खातिर अपनों ने शहादत दी है। उनके नाम का सम्मान गौरवान्वित व रोमांचित करता है। शहीदों के परिजनों के सम्मान में हरि प्रसाद गोपी कृष्ण सराफ का विशेष सहयोग रहा है।
पति की शहादत, फिर भी बेटे को सेना में भेजा
देश के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले जिले के शहीद सैनिक श्याम बिहारी शाही की शहादत का किस्सा सुनाते हुए पत्नी वीरांगना लक्ष्मी शाही का झुर्रीदार चेहरा चमक उठता है। गर्व भरे लहजे में बताया कि देश तो आजाद हो चुका था, लेकिन गोवा पर पुर्तगालियों का कब्जा था, उसे आजाद कराने के लिए गए राजपूत राइफल्स में पति श्याम बिहारी शाही भी थे। उनकी शहादत हुई, लेकिन गोवा भारत का अंग बन गया। देशभक्ति का जज्बा ऐसा कि पति की शहादत के बाद इकलौते बेटे राजेंद्र शाही को भी फौजी बनाया। वर्तमान में राजेंद्र शाही सेवानिवृत्त होकर माता की सेवा कर रहे हैं।
लगता है कि आज भी सीमा पर देश की रक्षा कर रहे हैं पति
सियाचिन ग्लेशियर में शहीद हुए सैनिक रमेश कुमार की वीरांगना पत्नी शीला देवी गर्व से कहती हैं कि पति ने पाकिस्तानी आतंकवादियों को सरहद पार नहीं करने दिया था। रमेश कुमार की ड्यूटी दिसंबर 1994 में सियाचिन ग्लेशियर की सुरक्षा में लगी थी। नौ दिसंबर 1994 की रात माइनस सोलह डिग्री तापमान में रमेश कुमार और उनके साथी आतंकवादियों की घुसपैठ नाकाम करने के लिए पहाड़ चढ़ रहे थे। इस दौरान हिमस्खलन हो गया, रमेश और उनके पंद्रह सैनिक साथी बर्फ में दबकर शहीद हो गए। शीला देवी कहती हैं कि पति के अंतिम दर्शन तक नहीं हो सके। सेना ने उनका अस्थि कलश भेजा था। लगता है कि आज भी उनके पति सीमा पर देश की रक्षा कर रहे हैं।
विश्व शांति के लिए शहीद होने वाले पति पर गर्व
श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के तहत लिट्टे आतंकवादियों को काबू करने गई भारतीय पीस कीपिंग फोर्स के सदस्य रणजीत सिंह की वीरांगना सुमित्रा सिंह गर्व से कहती हैं कि विश्व शांति के लिए शहादत देने वाले पति पर उन्हें गर्व है। सुमित्रा सिंह याद करते हुए बताती हैं कि रणजीत सिंह दो माह की छुट्टी पर आए थे, लेकिन मई 1989 के अंतिम सप्ताह टेलीग्राम आने पर ड्यूटी पर लौट गए। आठ अप्रैल 1989 को टेलीग्राम आया। इसमें उनकी शहादत की जानकारी दी गई। वह लिट्टे आतंकवादियों से मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। 1990 में सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र प्रदान किया। देश का इतना बड़ा सम्मान विरलों को ही मिलता है।
शहीद पिता से मिला जान देकर सरहद की रक्षा करने का जज्बा
भारत-चीन सीमा पर देशवासियों की रक्षा के दौरान शहीद हुए राघव प्रसाद पांडेय को उनके सैनिक पुत्र सच्चिदानंद पांडेय अपना आदर्श मानते हैं। 1967 में सीमा की सुरक्षा के लिए सिक्किम के नाथुला दर्रे पर बाड़बंदी का काम हो रहा था। 12 सितंबर 1967 को अचानक चीन की सेना ने आक्रमण कर दिया। सीधी लड़ाई में भारतीय सेना के आयुध समाप्त हो गए थे। भारतीय सैनिकों ने संगीन (बंदूक की नोक पर लगे चाकू) से चीनी सैनिकों पर हमला बोला था। हमले में चीन के 400 सैनिक मार गिराए थे, जबकि राघव प्रसाद पांडेय सहित भारत के 80 सैनिक शहीद हो गए थे। सच्चिदानंद मात्र पांच माह के थे, जब पिता राघव प्रसाद शहीद हुए थे। बड़े होने पर माता मालती देवी ने इकलौते बेटे सच्चिदानंद को भी देश की सेवा के लिए फौज में भेजा।
जलसमाधि नहीं अमर हो गए बिंदेश्वरी प्रसाद
श्रीलंका में शांति बहाल करने भेजी गई भारतीय सेना के सदस्य बिंदेश्वरी प्रसाद की वीरांगना बतीसी देवी फख्र से कहती हैं कि जल समाधि के साथ ही उनके पति अमर हो गए। श्रीलंका में लिट्टे उग्रवादियों के खिलाफ सफल अभियान चलाने वाली टीम का हिस्सा रहे बिंदेश्वरी प्रसाद 6 नवंबर 1989 को त्रिंकोमाली से मद्रास आने के लिए नौसेना के जहाज एमवी अकबर से आ रहे थे। रास्ते में यह जहाज डूब गया। इसमें बिंदेश्वरी प्रसाद सहित कई भारतीय सैनिक जल समाधिस्थ हो गए थे।
शहीद बेटे के माता-पिता होने पर गर्व है
दो पाकिस्तानी आतंकवादियों को जहन्नुम भेजने के बाद शहीद हुए संतोष पांडेय के माता-पिता होने पर सुशीला पांडेय और देवशरण पांडेय को गर्व है। सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त पिता देव शरण पांडेय कहते हैं कि मेधावी होने के बावजूद बेटे संतोष ने उनकी तरह सैनिक बन कर देश की रक्षा करने का संकल्प लिया। 2009 में संतोष की तैनाती श्रीनगर में थी। डल झील मेें आतंकवादियों के होने पर उनकी टीम ने घेराव किया। दो आतंकवादियों को ढेर करने के बाद संतोष शहीद हो गए। देवशरण पांडेय उस समय त्रिपुरा में तैनात थे और शहीद बेटे के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच सके। चेहरे पर चमक लिए हुए कहते हैं कि शहीद कभी मरते नहीं हैं। अंतिम संस्कार तो शरीर का होता है, सैनिक संतोष तो अमर है।
शहादत के चंद मिनट पहले हुए बात नहीं भूलती
जम्मू के पंथा चौक स्थित स्कूल में बच्चों को बंधक बनाए आतंकवादियों से मोर्चा लेने के दौरान शहीद हुए साहब शुक्ला की वीरांगना शुभा शुक्ला को घटना के चंद मिनट पहले पति से हुई बात आज तक याद है। सीआरपीएफ दिल्ली में तैनात साहब शुक्ला 20 जून 2017 को जम्मू स्थानांतरित हुए थे। 24 जून को ड्यूटी समाप्त होने के बाद लौट रहे थे कि आतंकवादियों के एक स्कूल में बच्चों को बंधक बनाने की सूचना के साथ आला अधिकारियों ने उन्हें तुरंत मौके पर पहुंचने का आदेश दिया। शुभा शुक्ला बताती हैं शाम करीब पांच बजे पति से फोन पर बात हो रही थी। वह घर में सबका हालचाल ले रहे थे। अचानक बोले कि शुभा फोन रखो। पांच मिनट बाद फोन आया कि साहब शहीद हो गए हैं। घात लगाए आतंकवादियों ने उनके वाहन पर गोलियों की बौछार कर दी थी। कहती हैं कि देश के लिए शहीद होने वाले विरले होते हैं, गर्व है कि वह उन विरले परिवारों में शामिल हैं।