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UGC की नई इक्विटी रेगुलेशंस 2026 के खिलाफ विरोध तेज, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल

उच्च शिक्षा परिसरों में समानता को बढ़ावा देने के लिए University Grants Commission (UGC) द्वारा अधिसूचित नई UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 के खिलाफ विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। सोमवार (26 जनवरी 2026) को इस मुद्दे पर कानूनी, राजनीतिक और छात्र संगठनों के स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।

इन नियमों में “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा और झूठी शिकायतों के खिलाफ प्रावधानों को हटाए जाने को लेकर आलोचक सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि नियमों में “सामान्य वर्ग” के छात्रों के हितों की अनदेखी की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, याचिका दाखिल

UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 को चुनौती देते हुए Supreme Court of India में एक रिट याचिका दायर की गई है। यह याचिका बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ता मृ्त्युंजय तिवारी ने दाखिल की है। उनके वकील नीरज सिंह के अनुसार, मामले को मंगलवार को अदालत में सूचीबद्ध कराने की कोशिश की जा रही है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि नियमों में जाति-आधारित भेदभाव को एकतरफा मानकर परिभाषित किया गया है, जिससे सामान्य या उच्च जातियों को संरक्षण से बाहर कर दिया गया है और उनके खिलाफ “दोष की पूर्वधारणा” बनती है।

राजनीतिक स्तर पर भी विरोध

राज्यसभा सांसद Priyanka Chaturvedi ने सोशल मीडिया पर नियमों को “वापस लेने या आवश्यक संशोधन करने” की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कानून सभी के लिए समान सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करना चाहिए। साथ ही उन्होंने झूठे आरोपों, दोष निर्धारण और भेदभाव की परिभाषा को लेकर भी स्पष्टता की मांग की।

उत्तर प्रदेश बीजेपी के एमएलसी Devendra Pratap Singh ने UGC को पत्र लिखकर कहा कि नियम दलितों और पिछड़े वर्गों की सुरक्षा के नाम पर सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे जाति-आधारित विभाजन बढ़ सकता है और सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है।

छात्र संगठनों की आपत्ति

उत्तराखंड के नैनीताल स्थित Kumaun University के छात्र संघ ने भी इन नियमों का विरोध किया है। छात्र संघ ने विश्वविद्यालय के कुलपति के माध्यम से UGC को भेजे गए पत्र में कहा कि ये नियम “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत” के खिलाफ हैं और इससे कैंपस में भय और अविश्वास का माहौल बन सकता है, जिससे दुरुपयोग की आशंका बढ़ेगी।

समर्थन और सफाई भी सामने आई

विरोध के बीच बीजेपी सांसद Nishikant Dubey ने सोशल मीडिया पर कहा कि नए नियमों को लेकर फैली सभी भ्रांतियां जल्द दूर की जाएंगी। उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व वाली सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10% आरक्षण लागू किया है और भरोसा दिलाया कि उच्च जातियों के छात्रों के हित सुरक्षित रहेंगे।

नियमों की पृष्ठभूमि और विवाद की वजह

UGC ने 13 जनवरी 2026 को इन नियमों को अधिसूचित किया था, जो 2012 के पुराने नियमों का संशोधित रूप हैं। नए नियमों में “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के खिलाफ भेदभाव तक सीमित कर दिया गया है। साथ ही, 2025 के ड्राफ्ट में शामिल झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान अंतिम अधिसूचना से हटा दिया गया।

आलोचकों का कहना है कि यही बदलाव सबसे बड़ा विवाद है। वहीं, कुछ एंटी-कास्ट कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ये नियम SC, ST और OBC छात्रों को भी पर्याप्त सुरक्षा नहीं देते, खासकर प्रवेश, इंटरव्यू और मौखिक परीक्षाओं जैसे चरणों में होने वाले भेदभाव के मामलों में।

इस्तीफों से बढ़ी सियासी हलचल

इस विवाद के बीच बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंक अग्निहोत्री ने UGC नियमों से असंतोष जताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके अलावा, लखनऊ में बीजेपी के करीब एक दर्जन स्थानीय कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी से इस्तीफा सौंप दिया है, जिससे यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक तूल पकड़ता दिख रहा है।

UGC की इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर चल रहा यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने की संभावना है, क्योंकि मामला अब सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद और विश्वविद्यालय परिसरों तक पहुंच चुका है।

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