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ईरान पर अमेरिकी हमला: परमाणु ठिकानों को निशाना बनाकर युद्ध में सीधे कूदा वॉशिंगटन

अमेरिका ने रविवार को ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों – फोर्डो, नतांज़ और इस्फहान – पर बमबारी की, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन हमलों की पुष्टि करते हुए कहा कि “यह सैन्य रूप से बेहद सफल ऑपरेशन था” और अब सभी अमेरिकी विमान ईरान की वायु सीमा से बाहर निकल चुके हैं।

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा, “हमने ईरान के तीन परमाणु स्थलों पर बेहद सफल हमला किया है। सभी लड़ाकू विमान अब ईरानी वायु सीमा से बाहर हैं।”

यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है। 13 जून को इज़राइल ने ईरान पर अचानक हमले शुरू किए थे, जिसमें परमाणु ठिकानों और शीर्ष सैन्य अधिकारियों को निशाना बनाया गया। अब अमेरिका की इस सीधी सैन्य हस्तक्षेप से पूरे मध्य पूर्व में गंभीर सैन्य टकराव की आशंका बढ़ गई है।


हमले में क्या-क्या हुआ?


ईरान की प्रतिक्रिया

ईरान ने अमेरिका पर “कूटनीति को पूरी तरह बर्बाद करने” का आरोप लगाया है। ईरान के संयुक्त राष्ट्र में राजदूत अमीर सईद इरवानी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में कहा, “हमने बार-बार अमेरिका को इस युद्ध के दलदल में न फंसने की चेतावनी दी थी।”

ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अमेरिका के हमले “निर्दय सैन्य आक्रमण” हैं और अब बातचीत की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं।


हरमज़ जलडमरूमध्य की बंदी: वैश्विक तेल व्यापार पर असर

ईरान की संसद ‘मजलिस’ ने अमेरिका के हमलों के जवाब में रणनीतिक ‘स्ट्रेट ऑफ हरमज़’ को बंद करने के लिए मतदान किया है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक है। यदि ईरान इसे पूरी तरह बंद करता है तो भारत सहित कई देशों के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।


क्षति और हताहतों की जानकारी


भारत की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से बात कर तत्काल तनाव घटाने और वार्ता की प्रक्रिया बहाल करने की अपील की है। भारत ने इस क्षेत्र में स्थिरता और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर बल दिया है।


आगे क्या?

अब सवाल यह है कि ईरान किस रूप में जवाब देगा। ईरानी सैन्य अधिकारी कह चुके हैं कि जवाब “उचित समय, पैमाने और प्रकृति” के अनुसार दिया जाएगा। वहीं अमेरिका और इज़राइल की ओर से तैयारियां तेज कर दी गई हैं।

मध्य पूर्व में यह संकट न केवल क्षेत्रीय स्थिरता बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति के लिए भी एक गंभीर खतरा बन गया है।

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